साल 1859… कलकत्ता के मंच पर, एक रात, नाटक चल रहा था: ‘नील दर्पण’… दर्शक स्तब्ध बैठे थे. मंच पर एक बूढ़ी मां, साबित्री, अपने जवान, असहाय बेटे नवीन की ओर देख रही है. नवीन ने अपने खेत में नील उगाने से मना कर दिया है. अंग्रेज नीलकर, मिस्टर रोज हंसते हुए, नवीन को धक्क…