साल 1859… कलकत्ता के मंच पर, एक रात, नाटक चल रहा था: ‘नील दर्पण’… दर्शक स्तब्ध बैठे थे.
मंच पर एक बूढ़ी मां, साबित्री, अपने जवान, असहाय बेटे नवीन की ओर देख रही है. नवीन ने अपने खेत में नील उगाने से मना कर दिया है.
अंग्रेज नीलकर, मिस्टर रोज हंसते हुए, नवीन को धक्क देकर ज़मीन पर गिराते हुए कहते हैं, “तुम चावल उगाओगे? मैं तुम्हें ऐसा चावल उगाना सिखाऊंगा कि तुम फिर कभी ज़मीन की ओर देखोगे नहीं!”
नवीन: (दर्द में कराहते हुए) “हमारी ज़मीन… यह हमारी है! हम अपनी मर्जी से…”
उसके शब्द पूरे होने से पहले मिस्टर रोज के लाठियाल नवीन को खींचकर ले जाते हैं. थोड़ी देर बाद, नवीन को वापस लाया जाता है— उसकी आंखें निकाल ली गई हैं.
साबित्री: (ज़मीन पर गिरकर, चीखते हुए) “मेरा बेटा! हाय राम! मेरे नवीन को बख्श दो! मैं नील उगाऊंगी! मैं सब करूँगी!”
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. यातना से नवीन का शरीर शांत पड़ चुका था.
यह नाटक का एक दृश्य था, हॉल में बैठे दर्शक रो रहे थे. उन्हें पता था कि यह सिर्फ नाटक नहीं, बल्कि बंगाल के गांवों की सच्ची कहानी है, जहां हर रोज़ हज़ारों नवीन ऐसे ही मर रहे थे. यह नाटक एक आईना था जिसने बंगाल के हजारों गांवों में किसानों के साथ हो रहे अमानवीय अत्याचारों को पहली बार शहर के सामने ला खड़ा किया. यह नाटक सिर्फ कागज़ पर लिखी स्याही नहीं था, बल्कि किसानों के दिल से टपका खून था. जब यह नाटक कलकत्ता और ढाका के मंचों पर खेला गया, तो इसका अत्यधिक प्रभाव पड़ा. दर्शकों में शामिल शिक्षित बंगाली वर्ग, यहां तक कि ब्रिटिश अधिकारी और मिशनरी भी, इन दृश्यों को देखकर फूट-फूट कर रोने लगते थे.
इसी भयावह सच्चाई को नदिया ज़िले के चौगाचा गांव के दो भाई, दिगंबर बिस्वास और बिष्णुचरण बिस्वास, वर्षों से देख रहे थे.
दिगंबर, बड़े भाई, शांत और समझदार थे. बिष्णुचरण, छोटे भाई, क्रोधित और बेचैन थे. जब उन्होंने देखा कि उनके पड़ोसी गरीब किसान की खड़ी धान की फ़सल को नीलकरों के हाथी रौंद रहे हैं, तो उनकी आत्मा कांप उठी.
दिगंबर: (बिष्णुचरण से, धीमी और दृढ़ आवाज़ में) “भाई! अब यह अत्याचार और नहीं सहेंगे. अगर हम भी चुप रहे, तो हमारी आने वाली नस्लें हमें माफ नहीं करेंगी. हमें लड़ना होगा, लेकिन अकेले नहीं.”
बिष्णुचरण: “तो क्या करें, दादा? लाठियां उठाएं?”
दिगंबर: “नहीं. हमें एकता को हथियार बनाना होगा. बागान मालिक हम पर एक-एक करके हमला करते हैं. हम उन्हें एकजुट होकर जवाब देंगे.”
और 1859 की एक सुबह, दिगंबर और बिष्णुचरण ने गांव के बीचों-बीच खड़े होकर एक ऐतिहासिक घोषणा की. हज़ारों किसान इकट्ठा थे.
दिगंबर: “आज से हम शपथ लेते हैं— कोई भी किसान अपनी ज़मीन पर नील नहीं उगाएगा! अगर नीलकर कर्ज़ मांगने आए, तो हम सब मिलकर कहेंगे— हमारे पास कुछ नहीं है!” “आज से, इस ज़मीन पर सिर्फ धान उपजेगा. अब कोई भी कर्ज़ नहीं लेगा. बागान मालिकों की हर ज़्यादती का जवाब मिलकर दिया जाएगा!
किसानों ने उसी पल मिट्टी छूकर कसम खाई. यह कोई हिंसक विद्रोह नहीं था, बल्कि आत्म-सम्मान की पहली सामूहिक घोषणा थी. यह एक छोटी सी चिंगारी थी, जो जल्द ही पूरे बंगाल में जंगल की आग की तरह फैल गई. इसे ही नील विद्रोह (Indigo Revolt) कहा जाता है.
यह महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के बहुत सालों पहले की सच्ची कहानी है, जब सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह का आंदोलन हुआ. तब भारत पर ब्रिटिश हुकूमत का शिकंजा कस रहा था. बंगाल का नदिया ज़िला. यहां की मिट्टी इतनी उपजाऊ थी कि किसान इसे सोना मानते थे. उनके खेतों में धान की बालियां झूमती थीं, और घर दालों और सब्जियों से भरे रहते थे.
लेकिन, इस हरियाली पर एक काला दाग़ लगने लगा था— नील (Indigo) का. यूरोप में कपड़ों को रंगने के लिए नील की भारी मांग थी. इस मांग को पूरा करने के लिए, ब्रिटिश बागान मालिक (जिन्हें ‘नीलकर’ कहा जाता था) बंगाल की उपजाऊ ज़मीन पर कब्ज़ा करने लगे. किसानों को ‘ददन’ (Dadan) नामक एक छोटा सा पेशगी कर्ज़ दिया जाता था, और उनसे ज़बरदस्ती अनुबंध (Contract) पर हस्ताक्षर करवाए जाते थे कि उन्हें अपनी ज़मीन के बड़े हिस्से पर केवल नील ही उगाना होगा. यह तीनकठिया व्यवस्था कहलाती थी. यह कर्ज़ इतना होता था कि एक बार जो किसान इस जाल में फंसता था, वह पीढ़ी दर पीढ़ी इससे बाहर नहीं निकल पाता था.
सबसे बड़ी क्रूरता तो यह थी कि नील की फ़सल ज़मीन से सारे पोषक तत्व खींच लेती थी, जिससे ज़मीन अगली फ़सल (जैसे चावल) के लिए लगभग बंजर हो जाती थी. किसान भूख से मरने लगे, क्योंकि वे पेट भरने के लिए धान नहीं उगा पा रहे थे.
जब-जब किसी किसान ने विरोध किया या अपनी ज़मीन पर धान उगाने की कोशिश की, तो नीलकरों की क्रूरता की हद पार हो जाती थी.
- उनके गुंडे (जिन्हें लाठियाल कहते थे) गांवों में खुलेआम घूमते थे.
- खड़ी धान की फ़सलों को हाथियों से कुचलवा दिया जाता था, ताकि किसान टूट जाएं.
- अगर किसी ने आवाज़ उठाई, तो बागान मालिक, अपने लाठियालों के साथ, घरों में आग लगा देते, महिलाओं का अपमान करते और पुरुषों को अमानवीय यातना गृहों में ले जाकर तब तक पीटते, जब तक वे दम न तोड़ दें.
- विरोध करने वाले किसानों को गुप्त यातना गृहों में ले जाया जाता था. वहां उन्हें कई दिनों तक भूखा रखा जाता, उल्टा लटकाया जाता और ‘बैंबू स्टीम’ (बांस के डंडों से क्रूर पिटाई) दी जाती थी.
- महिलाओं के साथ बर्बरता आम बात थी. नीलकर अक्सर किसानों को कर्ज़ के बदले अपनी पत्नी या बेटी को सौंपने के लिए मजबूर करते थे.
यह एक ऐसा जीवन था, जहां किसान अपने ही देश और अपनी ही ज़मीन पर गुलामों से भी बदतर हो गए थे.
इसी अंधकार में, नदिया ज़िले के चौगाचा गांव से एक उम्मीद की किरण फूटती है. ये थे दो भाई— दिगंबर बिस्वास और बिष्णुचरण बिस्वास.. दिगंबर बिस्वास बहुत समझदार थे. उन्होंने केवल लाठी नहीं उठाई. उन्होंने अंग्रेजी क़ानून का अध्ययन किया और किसानों को सिखाया कि कैसे कानूनी दांवपेंच से नीलकरों को अदालत में घेरा जा सकता है.
जब नीलकर अपने लाठियालों के साथ चौगाचा पहुंचे, तो उन्हें पहली बार लाठियों की नहीं, बल्कि हज़ारों किसानों की एकता का सामना करना पड़ा. नीलकर बौखला गए. वे मुकदमा करने गए, ज़मीन ज़ब्त करने की कोशिश की, लेकिन दिगंबर बिस्वास ने किसानों को कानून की बारीकियां सिखाईं. उन्होंने किसानों को संगठित किया और सामूहिक रूप से नीलकरों पर कानूनी केस दर्ज करवाए. यह विद्रोह जंगल की आग की तरह नदिया से लेकर जैसोर, पबना और मुर्शिदाबाद तक फैल गया.
बिस्वास बंधुओं का यह विद्रोह एक मोड़ साबित हुआ. बिस्वास बंधुओं के ज़बरदस्त संगठन के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा. 1860 में नील आयोग (Indigo Commission) का गठन किया गया. आयोग ने माना कि नीलकरों की क्रूरता अमानवीय थी और उन्होंने किसानों को धोखे से बंधुआ बनाया था.
दिगंबर और बिष्णुचरण बिस्वास ने अपनी जान नहीं गंवाई, लेकिन उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति और जीवन इस आंदोलन में झोंक दिया. उन्होंने बंगाल के लाखों किसानों को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया. इस पूरी मार्मिक कहानी को अमरता मिली एक साधारण शिक्षक और नाटककार दीनबंधु मित्र.के माध्यम से.
दीनबंधु मित्र ने बंगाल के गांवों का दौरा किया था और हर एक क्रूरता, हर एक आंसू को करीब से देखा था. 1860 में, उन्होंने अपना नाटक ‘नील दर्पण’ (The Indigo Mirror) लिखा. यह नाटक इतना सच्चा था कि इसमें किसानों की पीड़ा, उनकी गरीबी और नीलकरों के अत्याचारों को कागज पर हूबहू उतार दिया गया.
यह नाटक सिर्फ मनोरंजन नहीं था, यह जागरूकता का एक शक्तिशाली हथियार था. इसने सरकार और पूरे समाज को मजबूर कर दिया कि वे किसानों की पीड़ा को अनदेखा न करें.
