हिमालय की ऊंची चोटियों में छिपा एक ऐसा दर्रा जो न केवल भारत-चीन सीमा का संवेदनशील बिंदु है बल्कि एक ऐसा रहस्य भी समेटे हुए है जो विज्ञान और कल्पनाओं की सीमाओं को चुनौती देता है. Kongka La Pass कोंगका ला पास, लद्दाख के पूर्वी हिस्से में स्थित यह जगह, अननोन फ्लाइंग ऑब्जेक्ट्स UFO (यूएफओ) की साइटिंग्स के लिए कुख्यात है. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि यहां एलियंस का गुप्त अंडरग्राउंड बेस हो सकता है. लेकिन क्या यह सच्चाई है या सिर्फ लोककथाओं का एक जाल है?
साक्ष्यों और स्रोतों के आधार पर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला कोंगका ला पास, जिसे कोंगका पास भी कहा जाता है, हिमालय की कराकोरम रेंज के एक स्पर पर स्थित एक निम्न पर्वतीय दर्रा है. यह भारत-चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा LAC (एलएसी) पर है और समुद्र तल से 5,171 मीटर ऊंचाई पर स्थित है. इसका निर्देशांक 34°20′06″N 79°02′07″E है. यह चांग चेनमो घाटी में स्थित है, जो उत्तरी कराकोरम रेंज और दक्षिणी चांगचेनमो रेंज के बीच एक अवनमन है. पश्चिम में कुगरांग नदी की घाटी है जबकि पूर्व में चांगल़ुंग और क्यापसांग नदियां बहती हैं. भारतीय क्षेत्र में हॉट स्प्रिङ्स (क्याम या कियाम) नामक जगह पास के पास है, जहां से पैट्रोल पॉइंट पीपी-17ए रूट गुजरता है.
दक्षिण में सिलुंंगयोक्मा, सिलुंगबरमा, सिलुंंगकोंगका और स्टाथराव जैसी सहायक नदियां बहती हैं, जिनमें से कुछ चीनी नियंत्रण में हैं. पूर्व में क्युंगांग ला के रास्ते पाङ्गोंग झील तक पहुंचा जा सकता है. यह दर्रा चीन के शिनजियाङ स्वायत्त क्षेत्र (अक्साई चिन) और तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के बीच विभाजक रेखा भी है. चीन ने यहां कोंगका शांगकौ नामक सैन्य बेस स्थापित किया है, जो क्यापसांग और चांगचेनमो नदियों के संगम पर 5,070 मीटर ऊंचाई पर है और कई हाईवे से जुड़ा है.
ऐतिहासिक रूप से, यह क्षेत्र 1962 के भारत-चीन युद्ध से जुड़ा है. युद्ध के बाद दोनों देशों ने सहमति जताई कि इस क्षेत्र में पैट्रोलिंग नहीं होगी और इसे दूर से ही निगरानी में रखा जाएगा. 1959 में यहां एक सीमा संघर्ष भी हुआ था. इस नो-मैन्स लैंड की दुर्गमता ने इसे रहस्यों का अड्डा बना दिया, जहां न तो कोई बसता है और न ही आसानी से पहुंचा जा सकता है.
UFO साइटिंग्स की रिपोर्ट्स:
कोंगका ला पास की रहस्यमयी दुनिया UFO साइटिंग्स से भरी पड़ी है. स्थानीय लोग, चाहे भारतीय हों या चीनी, अक्सर बताते हैं कि जमीन से अजीब चमकदार वस्तुएं निकलकर आकाश में गायब हो जाती हैं. हिन्दू तीर्थयात्री, जो माउंट कैलाश की ओर जाते हुए पश्चिमी छोर से गुजरते हैं, ने हाल ही में त्रिकोणीय चमकदार वस्तुओं को आकाश में देखे जाने की बात कही है. स्थानीय गाइड्स के अनुसार, यहां त्रिकोणीय आकृतियां भूमिगत क्षेत्र से निकलकर लगभग लंबवत दिशा में उड़ती हैं और अक्साई चिन झील क्षेत्र में यूएफओ क्लस्टर सबसे ज्यादा दिखते हैं.
एक उल्लेखनीय घटना 2004 की है, जब हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में स्पेस एप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद के डॉ. अनिल कुलकर्णी के नेतृत्व में एक भूवैज्ञानिक और ग्लेशियोलॉजिस्ट टीम ने एक चार फुट ऊंचे रोबोट जैसी आकृति को पहाड़ी किनारे पर चलते फिल्माया. वह आकृति ऊर्ध्वाधर दिशा में उड़कर गायब हो गई. 2012 में, 1 अगस्त से 15 अक्टूबर तक, इंडो-तिब्बती बॉर्डर पुलिस और भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में 100 से ज्यादा चमकदार वस्तुओं की साइटिंग्स रिपोर्ट कीं.
सितंबर 2012 में, पैंगोंग झील के ऊपर 160 किलोमीटर लंबी रिबन आकार की वस्तु देखी गई, जो भारत-चीन सीमा पर थी. सेना ने मोबाइल ग्राउंड-बेस्ड रडार और स्पेक्ट्रम एनालाइजर का इस्तेमाल किया लेकिन रडार ने इसे डिटेक्ट नहीं किया (क्योंकि यह गैर-धातु था) और स्पेक्ट्रम में कोई सिग्नल नहीं मिला. एक रिकॉन्सेंस ड्रोन भी लॉन्च किया गया लेकिन ऊंचाई पर वस्तु से नजर हट गई. पायलट्स भी बताते हैं कि यहां उनके नेविगेशन उपकरण खराब हो जाते हैं, जिससे वे इस दर्रे को पार करने से बचते हैं.
थ्योरीज और साक्ष्य:
सबसे लोकप्रिय थ्योरी यह है कि कोंगका ला पास में एलियंस का गुप्त अंडरग्राउंड बेस है, जिसे भारत का ‘एरिया 51’ कहा जाता है. सिद्धांतकारों का मानना है कि क्षेत्र में कुछ गुफाएं हैं जो कभी दिखती हैं तो कभी गायब हो जाती हैं. सोडा प्लेन में मुख्य बेस होने की अफवाह है, जहां एलियंस कराकोश नदी का इस्तेमाल करते हैं, जो अक्साई चिन की सबसे बड़ी नदी है. क्षेत्र की पपड़ी अन्य जगहों से दोगुनी मोटी होने से गहरे भूमिगत बेस की थ्योरी मजबूत होती है, जो टेक्टॉनिक प्लेट्स तक फैले हो सकते हैं. यूएफओ, खासकर फ्लाइंग सॉसर प्रकार के, यहां भूमिगत संचालन के लिए इस्तेमाल होते हैं. दोनों सरकारें इसकी जानकारी रखती हैं लेकिन छुपा रही हैं.
साक्ष्य के रूप में, 2006 में Google मैप्स पर सैन्य सुविधाओं जैसे दिखने वाले संरचनाएं वहां दिखीं, जो लोगों को हैरान कर गईं. लेकिन ठोस प्रमाण की अभी भी कमी है. लोगों की बिना वैज्ञानिक साक्ष्य की बातें, स्थानीय कथाएं, सेना की रिपोर्ट्स और 2004 की फिल्म फुटेज मुख्य साक्ष्य हैं.
हालांकि वैज्ञानिक इन दावों को खारिज करते हैं और बताते हैं कि ऐसे दावों के पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है, पर कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां की पृथ्वी की टेक्टॉनिक परत की गहराई से भी यूएफओ की धारणा को बल मिलता है. रडार फेलियर और ड्रोन लिमिटेशन जैसे तथ्य इस जगह को और रहस्यमय बनाते हैं. कोंगका ला पास का रहस्य आज भी अनसुलझा है. क्या यह प्राकृतिक घटना है, सैन्य परीक्षण है या वाकई यहां एलियंस की मौजूदगी है? साक्ष्य पर्याप्त हैं लेकिन पुष्टि नहीं की गई है. ये जगह हमें याद दिलाती है कि हिमालय के अंदर छुपे अनगिनत रहस्य अभी भी इंतजार कर रहे हैं.
संदर्भ स्रोत
- विकिपीडिया: कोंगका पास का भूगोल और इतिहास.
- टाइम्स नाउ: यूएफओ थ्योरीज और 2006 गूगल मैप्स एविडेंस.
- अनसॉल्व्ड मिस्ट्रीज इंडिया: 2004 और 2012 साइटिंग्स की डिटेल्स और सेना रिपोर्ट्स.
