पीटर नवारो का ज्ञान बम; फेल ब्राह्मण बवाल मिशन

पीटर नवारो का ज्ञान बम; फेल ब्राह्मण बवाल मिशन

अरे पीटर नवारो, ये तो हद हो गई भाई! तुम तो कमाल के ज्ञानी निकले! एक ही वार में तुमने भारत के 1.4 अरब लोगों की सामाजिक-आर्थिक संरचना को निशाना बनाया और ऐसा मिसफायर किया कि अंग्रेजों की “फूट डालो, राज करो” वाली किताब सीधे खुल गई.

तालियां तो बनती हैं, भाई! तुम्हारा ये दावा कि ब्राह्मण भारत की सारी कमाई की मलाई खा रहे हैं, वो तो ऐसा है जैसे कोई कहे कि अमेरिका का सारा पैसा हॉलीवुड स्टार्स के पास है. बस फर्क इतना है कि हॉलीवुड वाले कम से कम स्क्रिप्ट तो पढ़ लेते हैं, तुमने तो वो भी नहीं किया! चलो, जरा तफ्सील से समझाते हैं, पीटर जी. तुम्हें लगता है कि भारत का सारा पैसा ब्राह्मणों की जेब में जा रहा है, जैसे वे कोई गुप्त खजाना लूट रहे हों. लेकिन यार, थोड़ा रियलिटी चेक तो कर लो. भारत के टॉप बिजनेस टाइकून—मुकेश अंबानी, गौतम अडानी—ये ब्राह्मण नहीं, बनिया/अग्रवाल समुदाय से हैं.

ये वो लोग हैं जिनका बिजनेस दिमाग इतना तेज है कि तुम्हारी ट्रेड पॉलिसी को पलक झपकते डिकोड कर दें. अंबानी की रिलायंस तो भारत की अर्थव्यवस्था का ऐसा इंजन है, जो पेट्रोल, टेलीकॉम, और रिटेल तक सब चला रहा है. और अडानी? वो तो पोर्ट्स, पावर, और ग्रीन एनर्जी में ऐसा खेल रहे हैं कि दुनिया देख रही है. लेकिन तुम?

तुम तो 18वीं सदी के स्टिरियोटाइप में अटके हो, जहां ब्राह्मणों को हर चीज का विलेन बना दिया जाता था, और हां, ये सिर्फ अंबानी-अडानी की बात नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले लोग देश के हर कोने से आते हैं—मराठी, गुजराती, सिख, जैन, दलित, ओबीसी, सब. तुम्हारा “ब्राह्मण सब खा गए” वाला नैरेटिव तो ऐसा है जैसे कोई कहे कि अमेरिका का सारा पैसा सिर्फ वॉल स्ट्रीट के बैंकर खा रहे हैं. हकीकत में भारत का बिजनेस लैंडस्केप इतना डायवर्स है कि तुम्हारी सादी-सी थ्योरी उसके सामने फेल है. अगर तुमने थोड़ा सा भी रिसर्च किया होता—शायद एक गूगल सर्च, या X पर दो मिनट स्क्रॉल किया होता—तो तुम्हें पता चलता कि भारत की टॉप 10 कंपनियों में से ज्यादातर के मालिक अलग-अलग समुदायों से हैं. टाटा, बिरला, मित्तल—क्या इनके बारे में सुना है, पीटर? नहीं? अरे, कोई बात नहीं, अभी भी वक्त है, जाकर पढ़ लो. अब जरा बात करते हैं तुम्हारे इस बयान के पीछे की मंशा की. ये तो वही पुरानी औपनिवेशिक चाल है, ना? भारत को जातियों में बांट दो, एक को विलेन बना दो, और फिर बैठकर तमाशा देखो. लेकिन भाई, 2025 चल रहा है. भारत वो देश नहीं रहा जो तुम्हारे पुराने नक्शों में था.

आज का भारत स्टार्टअप्स, टेक यूनिकॉर्न्स, और ग्लोबल बिजनेस हब की बात करता है. यहां लोग जाति के चक्कर में कम, और इनोवेशन-प्रोग्रेस के चक्कर में ज्यादा हैं. तुम्हारा ये बयान तो ऐसा है जैसे कोई कहे कि अमेरिका आज भी काउबॉय और इंडियन्स की जंग में अटका है. थोड़ा अपडेट हो जाओ, यार! और सबसे मजेदार बात ये कि तुम्हें ये बयान देने की जरूरत ही क्यों पड़ी? अमेरिका में बैठकर, जहां तुम्हारे अपने इकोनॉमिक और पॉलिटिकल ड्रामे कम नहीं हैं, तुम्हें भारत की सामाजिक संरचना पर ज्ञान बांटने का ख्याल कैसे आया? शायद तुम्हें लगा कि भारत को लेक्चर देना आसान है. लेकिन भाई, भारत वो देश है जो 5,000 साल की सभ्यता को संभालकर, आज चांद और मंगल तक पहुंच रहा है. तुम्हारे इस एक बयान से कुछ नहीं बिगड़ने वाला, बस तुम्हारी किरकिरी हो रही है.

तो पीटर जी, एक सलाह: अगली बार भारत के बारे में कुछ बोलने से पहले, जरा होमवर्क कर लिया करो. X पर एक अकाउंट बना लो, थोड़ा स्क्रॉल करो, देखो लोग क्या कह रहे हैं. या फिर कोई इंडियन इकोनॉमिक्स की किताब उठाओ. और हां, जिन लोगों ने तुम्हें ये माइक थमाया, उनसे कहो कि अगली बार कोई ऐसा शख्स चुनें जो कम से कम फैक्ट्स चेक कर ले. अब जाओ, कॉफी पियो, और थोड़ा रिफ्लेक्ट करो कि ये क्या बवाल मचा दिया. भारत तो चलता रहेगा, तुम अपनी स्क्रिप्ट सुधार लो!

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