कल हमारी राजधानी दिल्ली के हृदय में, जहां लोकतंत्र की हवा चलती है, एक दृश्य घटा, जहां एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही है. अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी मंच पर हैं, तालिबान का झंडा उनके सामने, और पीछे बामयान बुद्धों की पेंटिंग – जिन्हें तालिबान ने ही उड़ाया था. लेकिन मंच के नीचे? सिर्फ पुरुष पत्रकार थे…कोई महिला नहीं. न कोई आवाज, न कोई सवाल.. जो महिलाओं के दर्द को छू सके. ये सीन 10 अक्टूबर 2025 को अफगान दूतावास में घटा, और भारत के लिए ये सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक शर्मिंदगी बन गई. सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, हंगामा मच गया – क्या ये तालिबानी विचारधारा का भारतीय मिट्टी पर उतरना है? इस मामले पर हमारी सरकार की चुप्पी का क्या कारण रहा?
अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी की दिल्ली यात्रा के दूसरे दिन, अफगान दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई. मुत्तकी ने भारत-अफगानिस्तान संबंधों, व्यापार, और सुरक्षा पर बात की, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में आमंत्रण सिर्फ 15-16 पुरुष पत्रकारों को मिला. महिला पत्रकारों को न आमंत्रित किया गया, न प्रवेश दिया. भारतीय पक्ष ने सुझाव दिया था कि महिलाओं को शामिल करें, लेकिन तालिबानी अधिकारियों ने साफ मना कर दिया.
- जब पत्रकारों ने अफगान महिलाओं के अधिकारों पर सवाल पूछा, मुत्तकी ने टालते हुए कहा, “ये सब प्रोपगैंडा है. हर देश की अपनी परंपराएं, कानून और सिद्धांत हैं.” लेकिन ये सवाल तो प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाहर ही खड़े थे – क्योंकि महिलाएं अंदर ही नहीं पहुंच सकी थीं.
- मुत्तकी की ये पहली आधिकारिक यात्रा थी तालिबान सत्ता में आने के बाद. इससे पहले ईरान के रास्ते भारत पहुंचे, और एस जयशंकर से मुलाकात की. भारत ने काबुल में अपनी तकनीकी टीम को दूतावास में अपग्रेड करने की घोषणा की, लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस विवाद ने सबको झकझोर दिया.
सोशल मीडिया का तूफान: #WomenOutOfPress से #TalibanInIndia तक
- जर्नलिस्ट्स का गुस्सा: पत्रकार नयनीमा बसु ने एक्स पर लिखा, “सरकार की नाक के नीचे, राजधानी में, अफगान मंत्री महिला पत्रकारों को बाहर रखकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है. ये कैसे मंजूर?” गीता मोहन ने कहा, “महिला पत्रकारों को आमंत्रित ही नहीं किया गया. अस्वीकार्य!” आलिशान जाफरी ने तीखा व्यंग्य किया: “भारत में प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय महिलाएं तालिबान की पसंद के मुताबिक नहीं आ सकतीं?”
- ट्रेंडिंग हैशटैग्स: #JusticeForAfghanWomen, #NoWomenNoPress, और #TalibanInDelhi जैसे टैग्स वायरल हो गए. एक्स पर हजारों पोस्ट्स, जहां यूजर्स पूछ रहे हैं – “क्या भारत अब तालिबानी नियमों का पालन करेगा?” एक यूजर ने लिखा, “मोदी जी की ‘महिलाओं का सम्मान’ वाली बातें अब कहां गईं?”
- सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर्स: अभिनेत्री तापसी पन्नू ने इंस्टाग्राम पर स्टोरी शेयर की, “ये सिर्फ अफगानिस्तान की समस्या नहीं, हमारी भी है” फेमिनिस्ट एक्टिविस्ट्स ने इसे ‘महिला-विरोधी कूटनीति’ का नाम दिया.
- वायरल वीडियो: अफगान दूतावास के बाहर खड़ी महिला पत्रकारों की क्लिप्स वायरल, जहां वो कह रही हैं, “हम ड्रेस कोड फॉलो कर रही थीं, फिर भी रोक दिया.”
राजनीतिक घेराबंदी: विपक्ष की चुटकी, सरकार की सफाई
- कांग्रेस का हमला: प्रियंका गांधी वाड्रा ने पीएम मोदी को टैग कर पूछा, “तालिबान प्रतिनिधि की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को हटाने पर आपकी स्थिति स्पष्ट करें. क्या महिलाओं के अधिकारों पर आपकी बातें सिर्फ चुनावी ड्रामा हैं?” पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, “मैं स्तब्ध हूं. पुरुष पत्रकारों को बाहर आना चाहिए था.” महुआ मोइत्रा ने तंज कसा, “पुरुष पत्रकार क्यों रुके रहे? तालिबानी मंत्री की प्रेस में महिला नो एंट्री पर केंद्र सरकार घिरी.”
- अन्य दल: टीएमसी और सपा ने इसे ‘महिला अधिकारों पर हमला’ बताया. अलका लांबा (महिला कांग्रेस) ने कहा, “मोदी की चुप्पी से साबित हो गया कि भाजपा-आरएसएस और तालिबान की सोच एक जैसी है.”
- सरकार का जवाब: विदेश मंत्रालय ने सफाई दी, “प्रेस इंटरैक्शन में भारत की कोई भूमिका नहीं. आमंत्रण मुंबई के अफगान कांसुल जनरल ने दिए. दूतावास भारतीय क्षेत्राधिकार से बाहर है.” लेकिन इस सफाई ने आग को और भड़का दिया – विपक्ष बोला, “तो क्या दूतावास में तालिबानी कानून लागू है?”
- यूएन ने कहा: जुलाई 2025 में संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान में महिलाओं पर “गंभीर, व्यापक और व्यवस्थित उत्पीड़न” की चेतावनी दी थी. तालिबान ने महिलाओं को शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया. ये प्रेस कॉन्फ्रेंस उसी का आईना है.
- भारतीय समाज का प्रतिक्रिया: फेमिनिस्ट ग्रुप्स ने दिल्ली में छोटे प्रदर्शन किए, जहां स्लोगन लगे – “महिलाओं की आवाज दबाओ मत!” कॉलेज कैंपस में डिबेट्स चल रहे हैं, जहां युवा पूछ रहे हैं, “क्या हमारी विदेश नीति तालिबान को वैधता दे रही है?”
- अंतरराष्ट्रीय मीडिया: बीबीसी और अल जजीरा ने इसे कवर किया, भारत की ‘महिला सशक्तिकरण’ इमेज पर सवाल उठाए.
सोचने वाली बात है कि “भारत में ‘बेटी बचाओ’ कैंपेन चल रहा है, और अफगान दूतावास में कैंपेन चल रहा है ‘बेटी बाहर रहेगी’!” ये प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि तालिबानी विचारधारा का भारतीय मंच पर घुसपैठ है. भारत में सोशल मीडिया का शोर, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, और जर्नलिस्ट्स का गुस्सा – ये सब बता रहा है कि हमारी लोकतांत्रिक संवेदनशीलता जिंदा है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये विवाद सिर्फ ट्वीट्स तक सीमित रहेगा, या सरकार कड़े कदम उठाएगी?
