कीव शहर. साल 1941. आसमान पर जर्मन फ़ौज के क्रूर काले साए मंडरा रहे थे. शहर के यहूदी समुदाय में एक अजीब सी फुसफुसाहट थी. दीवारें पोस्टर और आदेशों से पटी पड़ी थीं. आदेश साफ़ था: “सभी यहूदी, अपने ज़रूरी सामान और गरम कपड़े लेकर मंगलवार की सुबह 8 बजे निश्चित स्थानों पर इकट्ठा हो जाएं. यह पुनर्स्थापन (Resettlement) का आदेश है”.
एक समुदाय, जो पहले से ही डर के साये में जी रहा था, उसे लगा कि शायद अब उन्हें सुरक्षित जगह ले जाया जा रहा है. मांओं ने बच्चों के लिए डबल गर्म कपड़े पैक किए. बुजुर्गों ने अपनी ज़मीन-जायदाद के दस्तावेज़ साथ रखे.
जब वे हज़ारों लोग उन निश्चित स्थानों पर पहुंचे, तो उन्हें लंबी कतारों में पैदल कीव के बाहरी इलाके की ओर धकेला गया. दोनों तरफ़ जर्मन सिपाही थे, जिनकी बंदूकों की नोंक चमक रही थी. वे सब एक गहरी, प्राकृतिक खाई के मुहाने पर पहुंचे, जिसका नाम था बाबी यार… वहां हज़ारों लोगों का इंतज़ार था. लेकिन, न कोई ट्रेन थी, न कोई नया घर. उनके सामने थी केवल एक खाई, और उस खाई के किनारे खड़े थे मौत के सौदागर.
उन दो दिनों में (29 और 30 सितंबर 1941) उस खाई के अंदर जो घटा, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था… आगे क्या हुआ, इसे जानना इतिहास के सबसे क्रूर और निर्मम पन्नों को पलटने जैसा है.
यह कोई पुनर्स्थापन नहीं था. उन्हें पता नहीं था कि वे खुद चलकर अपनी कब्र की ओर जा रहे हैं… कतारों में लगे लोगों से उनके कपड़े, गहने, और यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों के खिलौने तक छीन लिए गए. जर्मन सैनिकों ने उन्हें छोटे-छोटे समूहों में बांटा और खाई के किनारे ले गए.
अचानक, मशीनगनों का शोर गूंज उठा. लगातार… बेरोकटोक. एक समूह गिरता, तो उसकी जगह दूसरे समूह को ला खड़ा किया जाता. यह सिलसिला घंटों नहीं, बल्कि पूरे दो दिन तक चला. कल्पना कीजिए कि एक के ऊपर एक लाशें गिर रही हैं, और उन लाशों के ढेर पर खड़े होकर अगले समूह को गोली मारी जा रही है.
एक रिपोर्ट के अनुसार, 33,000 से अधिक यहूदी सिर्फ़ 48 घंटों में वहां दफ़न हो गए थे. यह कोई युद्ध नहीं था, यह बर्बरता का एक व्यवस्थित नाटक था. बाबी यार, जिसका मतलब होता है ‘बूढ़ी महिला की खाई’, अब निर्दोषों के खून से सनी एक सामूहिक कब्रगाह बन चुकी थी.
समय बीता. जर्मनों को अपनी हार दिखने लगी. उन्हें डर था कि दुनिया को इस क्रूरता का पता चलेगा. उन्होंने एक भयानक साज़िश रची.
- उन्होंने सोवियत युद्धबंदियों को ज़बरदस्ती वहां लगाया.
- उनका काम था: लाशों को खोदकर निकालना और उन्हें बड़े-बड़े जलते हुए भट्टियों (Fornaces) में जला देना.
- मकसद था कि इस नरसंहार का कोई भी सबूत न बचे.
लेकिन, राख और धुआं भी इतिहास को पूरी तरह मिटा नहीं पाए. बाबी यार आज भी चुपचाप उस अमानवीय दर्द की कहानी सुना रहा है, जो इंसानों ने इंसानों को दिया था. यह जगह हमें याद दिलाती है कि जब नफ़रत और क्रूरता सिर उठाती है, तो इंसानियत किस तरह हार जाती है.
आज बाबी यार एक स्मारक है… एक चेतावनी है… कि इतिहास का यह दर्दनाक अध्याय, कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए. इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जो सिर्फ त्रासदी नहीं, बल्कि मानवीय क्रूरता की एक ऐसी गवाही हैं, जिसे दुनिया कभी भूल नहीं सकती. बाबी यार (Babi Yar) उन्हीं भयावह और मार्मिक जगहों में से एक है. यह एक गहरी, सूखी खाई है, जो यूक्रेन की राजधानी कीव के ठीक बाहर स्थित है और हज़ारों निर्दोष लोगों के अंतिम चीखों की कहानी अपने अंदर समेटे हुए है. इस नरसंहार का मुख्य लक्ष्य कीव में रहने वाले यहूदी (Jews) थे.
जर्मन रिपोर्टों के अनुसार, यहूदियों के अलावा, नाज़ियों ने बाबी यार में अगले दो वर्षों में हज़ारों सोवियत युद्धबंदियों (Prisoners of War), रोमा (Gypsies), और यूक्रेनी राष्ट्रवादियों को भी मार डाला था. माना जाता है कि 1941 से 1943 के बीच बाबी यार में 1 लाख से 1.5 लाख लोग मारे गए थे.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, सोवियत संघ ने इस नरसंहार को जातीय यहूदी त्रासदी के रूप में उजागर करने के बजाय, इसे “सोवियत नागरिकों” पर हुआ अत्याचार कहकर, इसकी विशिष्ट यहूदी पहचान को मिटा देने की कोशिश की. दशकों तक, बाबी यार की दर्दनाक कहानी को एक तरह से दबा दिया गया था. मगर, कवि येवगेनी येवतुशेंको ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘बाबी यार’ में इस सत्य को आवाज़ दी, जिसने इस स्थान की सच्चाई को एक बार फिर दुनिया के सामने ला खड़ा किया.
