साल 2012 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में जब 319 मिनट की एक भारतीय फिल्म दो भागों में दिखाई गई, तो अंतरराष्ट्रीय दर्शकों ने खड़े होकर तालियां बजाई थीं. वह फिल्म थी अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’.
धनबाद के कोयला माफिया, बदले की तीन पीढ़ियों और खून-खराबे के बीच बुनी गई यह दास्तान सिर्फ एक क्राइम-थ्रिलर नहीं है; यह भारतीय सिनेमा के इतिहास का वह मोड़ है जहाँ से हिंदी सिनेमा ने ‘ग्लैमर का नकाब’ उतारकर ज़मीन की धूल चाटी थी.
बॉलीवुड के फॉर्मूले का कत्ल
वासेपुर से पहले हिंदी सिनेमा में गैंगस्टर या तो अमिताभ बच्चन की तरह एंग्री यंग मैन हुआ करते थे या फिर राम गोपाल वर्मा के ‘सत्या’ जैसे खामोश, अंडरवर्ल्ड के अंधेरे प्यादे. लेकिन वासेपुर ने एक नया ही मुहावरा गढ़ा:
- किरदारों का ढीठपन: यहां सरदार खान (मनोज बाजपेयी) बदला लेने के संकल्प के साथ-साथ अपनी घरेलू कमज़ोरियों और वासनाओं से भी जूझता है. यहां कोई भी मसीहा नहीं है; सब ग्रे और स्वार्थी हैं.
- संवादों की ज़मीनी खुरदराहट: जीशान कादरी के लिखे संवाद किसी स्टूडियो में बैठकर नहीं गढ़े गए थे, बल्कि वे वासेपुर की गलियों से सीधे उठाए गए थे. “बाप का, दादा का, भाई का… सबका बदला लेगा रे तेरा फैजल” सिर्फ डायलॉग नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का फ्रस्ट्रेशन बन गया.
सिनेमैटोग्राफी और संगीत: बिहार की लोक-लय पर आधुनिक रॉक
राजीव रवि की हैंडहेल्ड कैमरा तकनीक (Handheld Camera) ने दर्शकों को सिनेमा हॉल से उठाकर वासेपुर की तंग गलियों में खड़ा कर दिया. कैमरा किरदारों के साथ भागता है, गिरता है और सांस लेता है.
वहीं स्नेहा खानवलकर का संगीत इस फिल्म की रीढ़ है. बिहार और त्रिनिदाद के लोकगीतों (जैसे ‘कह के लूंगा’ और ‘आई एम अ हंटर’) को इलेक्ट्रॉनिक बीट्स के साथ मिलाकर उन्होंने ऐसा साउंडट्रैक तैयार किया जिसने पारंपरिक बॉलीवुड गानों की परिभाषा ही बदल दी.
‘सिनेमा ही लोगों को बेवकूफ बना रहा है’
फिल्म का सबसे मारक दार्शनिक प्रसंग रामाधीर सिंह का वह मोनोलॉग है—“जब तक इस देश में सिनेमा है, लोग बेवकूफ बनते रहेंगे.”
यह संवाद दरअसल दर्शकों के चेहरे पर एक तमाचा था. रामाधीर का किरदार जानता था कि वासेपुर के नौजवान फिल्मों के डायलॉग्स (कभी अमिताभ, कभी सलमान) की नकल करते-करते खुद अपनी ज़िंदगी तबाह कर रहे हैं. वासेपुर ने दिखाया कि पॉप-कल्चर किस तरह भारतीय समाज के अवचेतन में हिंसा को नॉर्मलाइज कर चुका है.
सिनेमाई संदर्भ एवं जर्नल्स (References):
- BioScope: South Asian Screen Studies (SAGE Journals): Gangs of Wasseypur and the Aesthetic of the Periphery: Realism, Dialect, and Small-Town India. DOI:
10.1177/0974927614548644 - Cahiers du Cinéma (Cannes Coverage 2012): The Epic Realism of Anurag Kashyap’s Coal-Mafia Chronicle.
- Film Quarterly (University of California Press): Soundscaping the Underworld: Folk-Fusion and Vernacular Modernity in Gangs of Wasseypur.



