क्या सिर्फ ‘देखते रहने’ से समय की रफ्तार थम सकती है?

क्या सिर्फ ‘देखते रहने’ से समय की रफ्तार थम सकती है?

एक पुरानी ग्रीक कहावत है—“उबलती हुई केतली को अगर लगातार देखते रहो, तो उसमें कभी उबाल नहीं आता (A watched pot never boils).” आम ज़िंदगी में यह सिर्फ सब्र रखने की एक सीख लगती है. लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि क्वांटम फिजिक्स की सूक्ष्म दुनिया में यह मुहावरा एक सचमुच का वैज्ञानिक नियम बन जाता है?

वैज्ञानिक इसे कहते हैं—क्वांटम ज़ीनो इफ़ेक्ट (Quantum Zeno Effect).

यह सिद्धांत दावा करता है कि अगर आप किसी अस्थिर सब-एटॉमिक कण (Subatomic Particle) को लगातार, बिना पलक झपकाए मापते या ‘ऑब्जर्व’ करते रहें, तो वह कभी विघटित (Decay) नहीं होगा. यानी आपका सिर्फ उसे ‘देखना’ उसके समय को फ्रीज कर देता है!

ज़ीनो का प्राचीन तीर और क्वांटम पहेली

पांचवीं सदी ईसा पूर्व में ग्रीक दार्शनिक एलीया के ज़ीनो (Zeno of Elea) ने एक पहेली रखी थी. उन्होंने कहा कि अगर हवा में उड़ते हुए किसी तीर को समय के एक अत्यंत छोटे हिस्से (Instant) में देखा जाए, तो उस खास क्षण में तीर स्थिर होता है—वह गति नहीं कर रहा होता. और यदि समय ऐसे ही अनगिनत स्थिर क्षणों का जोड़ है, तो गति तो वास्तव में संभव ही नहीं है; वह सिर्फ एक भ्रम है.

हज़ारों साल तक वैज्ञानिकों ने इसे दार्शनिक बकवास माना. लेकिन 1977 में भौतिक विज्ञानी जॉर्ज सुदर्शन (George Sudarshan) और बैद्यनाथ मिश्रा (Baidyanath Misra) ने जब इसे क्वांटम स्तर पर गणितीय रूप से सिद्ध किया, तो भौतिक विज्ञान की दुनिया सन्न रह गई.

प्रयोग की मेज़ पर थमा हुआ समय

क्वांटम स्तर पर कोई भी कण एक साथ कई अवस्थाओं (Superposition) में होता है. वह तरंग (Wave) भी है और कण (Particle) भी.

लेकिन जैसे ही कोई यंत्र या मानव आंख उसे ‘मापती’ (Measure) करती है, उसका ‘वेव फंक्शन’ अचानक सिकुड़ जाता है (Wave function collapses). वह तुरंत एक निश्चित अवस्था में आ जाता है.

यदि आप किसी रेडियोधर्मी परमाणु को लगातार और अत्यधिक तेज़ फ्रीक्वेंसी के साथ मापते रहें, तो हर बार उसका वेव फंक्शन रीसेट होकर शून्य (ग्राउंड स्टेट) पर आ जाता है. नतीजा? वह परमाणु कभी रेडियोएक्टिव क्षय (Radioactive Decay) का शिकार नहीं हो पाता। आपने सचमुच उसके समय के पहिये को थाम दिया है.

1989 में अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैंडर्ड्स एंड टेक्नोलॉजी (NIST) के वैज्ञानिकों ने लेज़र की मदद से बेरिलियम आयनों पर यह प्रयोग किया और पाया कि बार-बार लेज़र की निगरानी में रखे गए आयन अपनी स्थिति बदलने में पूरी तरह असमर्थ रहे.

क्या यह इंसानों पर भी लागू हो सकता है?

अब ज़रा अपनी कल्पना के दायरे को बढ़ाइए. हमारी कोशिकाएं, डीएनए और प्रोटीन के बॉन्ड्स भी आखिरकार उन्हीं अणुओं और परमाणुओं से बने हैं. क्या भविष्य में नैनो-ऑब्जर्वर्स के ज़रिए जैविक कोशिकाओं के क्षय (Cellular Decay/Aging) को क्वांटम स्तर पर धीमा किया जा सकता है?

शायद इस पहेली का जवाब आने वाले दशकों में मिले, लेकिन एक बात तय है—ब्रह्मांड उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है. वास्तविकता सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि क्या घट रहा है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे कौन और कैसे देख रहा है.

प्राथमिक संदर्भ एवं जर्नल्स (References):

  1. Misra, B., & Sudarshan, E. C. G. (1977). The Zeno’s paradox in quantum theory. Journal of Mathematical Physics, 18(4), 756–763. DOI: 10.1063/1.523304
  2. Itano, W. M., Heinzen, D. J., Bollinger, J. J., & Wineland, D. J. (1990). Quantum Zeno effect. Physical Review A, 41(5), 2295. DOI: 10.1103/PhysRevA.41.2295
  3. Nature Nanotechnology (2015): Experimental verification of Quantum Zeno dynamics in atomic spin systems. Nature Publishing Group.

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